विचार शक्ति
विचार शक्ति में बहुत सामर्थ्य है। जब तुम असमंजस में होते हो तो तुम्हारे शब्दों का दूसरों पर खास प्रभाव नहीं पड़ता। तुम्हारी सोच जितनी स्पष्ट होगी, तुम्हारे शब्दों को उतनी ही शक्ति मिलेगी। अगर तुम दुविधा में हो तो तुम्हारे शब्द भी कमज़ोर होंगे। प्राणायाम और ध्यान करने से मन स्वच्छ होता है। जो विचार उस स्वच्छ मन से आते हैं वो भी सीधे और स्पष्ट होते हैं। एक संतुष्ट व्यक्ति के शब्दों में भी ताक़त होती है।
भारत में प्रथा है बड़ों से आशीर्वाद लेने की। हम ये मानते हैं कि उनका मन शांत होता है। जब उस शांत मन से आशीर्वाद देते हैं तो उस आशीर्वाद में बहुत शक्ति होती है। विवाह हेतु निमंत्रण पत्र में परिवार के सबसे बड़े व्यक्ति का आशीर्वाद लिया जाता है। ऐसी ही प्रथा उत्तर अमरीका, औस्ट्रेलिया, और न्यूज़ीलैन्ड के मूल निवासियों में भी है। पूरी दुनिया में पुरानी सभ्यताओं में बड़ों के सम्मान की प्रथा रही है। इसके बिना, ५० वर्ष से अधिक उम्र के लोग भी अब अवसाद की ओर जा रहे हैं। इसे बदलना होगा । माता पिता भी आनंदित और उत्साहपूर्ण होने चाहिये। उम्र के साथ साथ प्रसन्न्ता भी बढ़ती रहनी चाहिये। जैसे जैसे आप की उम्र बढ़े, आपकी मुस्कुराहट भी बढ़ती जाये! ...संतुष्टि और पूर्णता से भरी। आपने अच्छा जीवन जिया है। अब आप अगली पीढ़ियों को आशीर्वाद दें। ये परिपक्वता है। ये संतुष्टि है। ये तब होता है जब आप रोज़मर्रा की क्रियाओं में आसक्त ना हों। जिन बातों से तुम्हें दुख होता है, उन्हें छोड़ दो। अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति जागरूक हो जाओ। अपना कर्तव्य करो पर चिंता ना करो। जो लोग काम करते हैं वो चिंता नहीं करते, और जो चिंता करते हैं वो काम नहीं करते। यह बदलाव तो लाना ही पड़ेगा। अन्यथा आप शिकायत करते रहते हैं – ‘फलां व्यक्ति मेरी बात नहीं सुनता, बहू मेरी बात नही सुनती...’
आप को अपनी कब्र तक शिकायतों के साथ नहीं जाना चाहिये।
सिर्फ़ उतना करो, जितना कर सकते हो। अपनी क्षमता को धीरे धीरे बढ़ाओ। इस तरह से हमें खुद को एक नई दिशा देनी है।