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परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी का परिचय

परम पूज्य श्री श्री रविशंकर जी एक मानवतावादी, आध्यात्मिक गुरु और विश्व में शांति के दूत है। उनके विशाल दृष्टिकोण ने आज दुनिया भर में लाखों लोगों को तनाव और हिंसा-रहित जीवन जीने का सामर्थ्य दिया है। आर्ट आफ़ लिविंग के कोर्स और सेवा कार्यों से वे समाज को एक नई सुबह की ओर ले जा रहे हैं, जहां प्राचीन मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकं’ (पूरा विश्व एक ही परिवार है) चिर परिचित जीवन शैली में जागृत हो जाये।

 

श्री श्री का प्रादुर्भाव

१३ मई, १९५६ में दक्षिण भारत में तमिल नाडू के पापनासम में जन्में श्री श्री रविशंकर, बालपन से ही अत्यधिक प्रतिभावान रहे। चार वर्ष की अल्पायु में उन्होंने पूरे श्रीमदभगवतगीता ग्रन्थ का पाठ सुनाया। उन्हें अक्सर ही गहन ध्यान में पाया जाता था। उनके प्रथम गुरु श्री सुधाकर चतुर्वेदी जी का महात्मा गाँधी से पुराना संबंध था। १७ वर्ष की आयु में ही श्री श्री ने वैदिक शिक्षा पूरी की तथा भौतिक शास्त्र में स्नातक की उपाधि भी प्राप्त की।

 

‘द आर्ट आफ़ लिविंग’ तथा ‘मानवीय मूल्यों के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ’ संस्थाओं की संस्थापना

भारत के कर्नाटक राज्य में शिमोगा में श्री श्री नें जनहितार्थ १० दिन का मौन धारण कर, साधना की। जन हित की इच्छा से किये गये तप के फलस्वरूप सुदर्शन क्रिया का प्रस्फुरण हुआ, जो कि आर्ट आफ़ लिविंग की कार्यशालाओं की धुरी बन गई। सुदर्शन क्रिया एक विशेष स्वांस प्रक्रिया है जिस से व्यक्ति अपने तन-मन को तनाव-मुक्त तथा निरोगी करने के साथ ही आत्मा को तृप्त करता है। श्री श्री हमें, व्यक्ति के विकास के ज़रिये समाज के विकास की ओर ले जा रहे हैं।

 

श्री श्री ने ‘द आर्ट आफ़ लिविंग फ़ाउन्डेशन’ संस्था की स्थापना की जो कि एक गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी, शैक्षिक और मानवतावादी संस्था है। इसके शैक्षिक और आत्म-विकास के कार्यक्रम तनाव-मुक्ति एवं व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिये शक्तिशाली तकनीकें प्रदान करते हैं। किसी विशेष देश या संस्कृति तक सीमित ना रह कर, यह तकनीकें विश्व में समाज के हर स्तर के लोगों के लिये उपयोगी सिद्ध हुई हैं।

 

१९९७ में श्री श्री नें ‘मानवीय मूल्यों के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ’ की स्थापना की और आर्ट ऑफ़ लिविंग संस्था के सहयोग से विश्व में स्थायी विकास कार्यक्रम, मानवीय मूल्यों की पुष्टि, तथा समाज में द्वंद समाधान की ओर कार्य शुरु किया। भारत, अफ्रीका और दक्षिण अमरीका में इन दोनों सहभागी संस्थाओं के स्वयंसेवी, ग्रामीण समूह में स्थायी विकास होने के लिये अग्रसर हैं और अब तक ३६,००० गाँवों में अपनी सेवा के ज़रिये पहुंच चुके हैं।

 

सेवा और ज्ञान का विश्वव्यापीकरण करने की प्रेरणा

एक विख्यात मानवतावादी होते हुये श्री श्री ने विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को सहायता प्रदान की है- प्राकृतिक आपदाओं, आतंवादी हमलों और युद्ध से पीड़ित, सीमावर्ती समुदायों में संघर्ष से पीड़ित बच्चे इत्यादि, इसमें सम्मलित हैं। काफी संख्या में स्वयंसेवियों के माध्यम से उनके संदेश की शक्ति से आध्यात्म पर आधारित सेवा की लहर उत्पन्न हो गयी है। यह स्वयंसेवी इन कार्यक्रमों को विश्व भर में संकटपूर्ण क्षेत्रों में आगे बढ़ा रहे हैं।

 

एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में श्री श्री ने योग और ध्यान की परंपरा को इस रूप में निखारा है कि वह २१ शताब्दी में सुसंगत हो सके। प्राचीन ज्ञान की पुनर्स्थापना करने के अलावा श्री श्री ने व्यतिगत और सामाजिक परिवर्तन करने के लिये नवीनतम तकनीकों का सृजन किया है। इसमें सम्मलित है सुदर्शन क्रिया, जिसने लाखों लोगों को तनाव से मुक्ति पाने में और रोजमर्रा के जीवन में ऊर्जा के भंडार से परिचित कराने में और शांति प्राप्त करने में सहायता की है। सिर्फ ३० ही वर्षों में श्री श्री के कार्यक्रमों के द्वारा १५१ देशों में लोगों के जीवन में व्यापक सुधार हुआ है।

 

शान्ति के दूत

शान्ति के दूत होते हुये श्री श्री, द्वंद समाधान में प्रमुख भूमिका निभाते हैं और विश्व भर में सार्वजनिक मंचों और सभाओं में शांति का प्रचार करते हैं।

 

संघर्ष से घिरे पीड़ितों के लिये श्री श्री आशा की ज़िंदगी लाते हैं। उन्हें एक तटस्थ एवं शांतिप्रिय व्यक्ति जानकर संघर्षों को शांत करने के लिये बुलाया जाता है। उन्होंनें इराक, आइवरी कोस्ट, कश्मीर और बिहार में संघर्ष-रत विरोधी दलों को एक साथ लाकर, बातचीत के ज़रिये, मसलों को हल करवाने की शोहरत हासिल है।

 

श्री श्री को करनाटक प्रदेश सरकार नें राजा कृष्णदेव राय के राज्याभिषेक की ५००वीं वर्षगांठ समारोह की स्वागत समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया, और जम्मू कश्मीर की प्रदेश सरकार नें उन्हें अमरनाथ श्राइन बोर्ड का सदस्य बनाया है। तनाव-मुक्त और हिंसा-मुक्त दिव्य समाज बनाने के अपने ध्येय को पूरा करने में श्री श्री नें अनेकों का जीवन सुंदर बनाया है।